सूर्य महादशा
भारत के अधिकांश ज्योतिषी समय का हिसाब विंशोत्तरी दशा से लगाते हैं। यह पद्धति जीवन को 120 वर्ष के एक चक्र में बाँटती है, जिसमें नौ ग्रहों की दशाएँ बारी-बारी से आती हैं। जन्म के समय चंद्र जिस नक्षत्र में था, वही तय करता है कि आपका जीवन किस दशा से शुरू हुआ और उसका कितना हिस्सा बाक़ी था। इस चक्र में सूर्य का हिस्सा सबसे छोटा है, केवल छह वर्ष। जिनका चंद्र कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी या उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में हो, उनका जीवन इसी दशा से आरंभ होता है; बाक़ी सबके लिए यह शुक्र की बीस साल की दशा के बाद आती है।
इंजन से
- ग्रह
- सूर्य
- विंशोत्तरी वर्ष
- 6
- अधिकार में नक्षत्र
- कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा
परंपरा में इसका अर्थ
ज्योतिष में सूर्य आत्मा और आत्मसम्मान का कारक है: अधिकार, पिता, जीवनशक्ति, समाज में पहचान और 'नहीं' कह पाने की क्षमता। परंपरा सूर्य की महादशा को ऐसा समय मानती है जब पहचान और पद के सवाल आगे आ जाते हैं। सरकार, संस्थाओं और ऊँचे पद पर बैठे लोगों से जुड़े काम अधिक महत्व पाते हैं, पिता या पिता-तुल्य व्यक्ति से रिश्ता ध्यान में आता है, और ज़िम्मेदारी टालने के बजाय उठाने की ओर झुकाव बढ़ता है। इस दशा की चाल तेज़ है, और इसके सबक आत्मविश्वास और अहंकार के बीच के फ़र्क़ से जुड़े हैं।
ग्रंथ यह साफ़ कहते हैं कि यह दशा उस सूर्य की है जो आपकी कुंडली में बैठा है, किसी काल्पनिक सूर्य की नहीं। जो सूर्य केंद्र या त्रिकोण का स्वामी हो और मेष या सिंह राशि में बली हो, उसकी दशा को पहचान और स्पष्ट दिशा देने वाली बताया गया है। जो सूर्य तुला राशि में हो, छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो, या पास बैठे ग्रहों से दबा हो, उसकी दशा में अहं की परीक्षा, पद पर सवाल और ऊर्जा को सँभालने की ज़रूरत बताई गई है। भाव-स्वामित्व भी उतना ही मायने रखता है: सिंह लग्न के लिए सूर्य लग्नेश है, कर्क लग्न के लिए वह दूसरे भाव का स्वामी है, और वही छह साल दोनों के जीवन के अलग-अलग कोनों को रोशन करेंगे।
महादशा के भीतर अंतर्दशाएँ विंशोत्तरी के तय क्रम में चलती हैं। पहले सूर्य की अपनी अंतर्दशा आती है, जो चार महीने से कुछ कम चलती है; फिर चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु और शुक्र की अंतर्दशाएँ एक के बाद एक आती हैं। हर अंतर्दशा का स्वामी अपने विषय साथ लाता है, इसलिए सूर्य महादशा में राहु की अंतर्दशा का रंग गुरु की अंतर्दशा से बिल्कुल अलग होता है। सावधान पाठक हमेशा दोनों स्वामियों को साथ रखकर देखता है।
इसका यह अर्थ नहीं है
सूर्य महादशा इस बात का फ़ैसला नहीं है कि आने वाले साल अच्छे होंगे या बुरे। एक ही दशा में पदोन्नति और टकराव दोनों हो सकते हैं, कभी-कभी एक ही अंतर्दशा के भीतर, और ग्रंथ परिणाम नहीं बल्कि झुकाव बताते हैं। यह नौकरी, विवाह, संतान या बीमारी की कोई तारीख़ नहीं है, और यह पन्ना आपको यह नहीं बता सकता कि इसके कौन से विषय आपके जीवन में दिखेंगे। यह कुंडली के बाक़ी हिस्से को भी बंद नहीं करता: गोचर, लग्नेश का बल और नवम तथा दशम भाव की स्थिति पूरे समय काम करती रहती है।
यह कौन से सवाल उठाता है
- 01सूर्य आपकी कुंडली में किस भाव में है, और लग्न से किन भावों का स्वामी है?
- 02सूर्य मेष या सिंह राशि में है, या तुला में, या पास बैठे ग्रहों से घिरा हुआ है?
- 03अभी कौन सी अंतर्दशा चल रही है, और उसका स्वामी कुंडली में सूर्य से कैसा संबंध रखता है?
- 04क्या शनि या राहु की दृष्टि सूर्य पर है, जो इस दशा के आत्मविश्वास में सावधानी जोड़ेगी?
- 05जन्म के समय चंद्र किस नक्षत्र में था, और पहली दशा का कितना हिस्सा बाक़ी था?
व्यवहार में
व्यवहार में ज्योतिषी सूर्य महादशा को तीन बातों से पढ़ना शुरू करता है: सूर्य किस भाव और राशि में है, वह किन भावों का स्वामी है, और इस समय किसकी अंतर्दशा चल रही है। इन्हीं से तय होता है कि जीवन के कौन से हिस्से सामने आ रहे हैं और क्या सूर्य में उन्हें सँभालने का बल है। Envisstack के विश्लेषण ठीक इन्हीं ग्रह-स्थितियों और अंतर्दशा की तारीख़ों का हवाला देते हैं, ताकि आप देख सकें कि कोई वाक्य किस तथ्य पर टिका है।
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